हमारा अंतरिक्ष Our Space in Hindi
हमारा अंतरिक्ष (Our Space)
अंतरिक्ष हमेसा से ही एक रोचक विषय रहा है । लगभग सभी
मनुष्यों का जिज्ञासा इसमे रहता है और यह है भी बहुत रोचक । बहुत से ऐसा तथ्व हैं
जिसको हमे जानना है । हम आसमान मे जो कुछ भी देखते हैं वो सब अंतरिक्ष का एक छोटा
सा हिस्सा है । वास्तव मे हमारा अंतरिक्ष हमारे सोच से भी बड़ा है। अंतरिक्ष वहां
से शुरू होता है जहां से पृथ्वी का वातावरण समाप्त होता है । अंतरिक्ष हमारे चारों
तरफ फैला हुआ है । अंतरिक्ष को अभी के किसी भी पैमानों से मापना संभव नही है इसलिए
प्रकाश-वर्ष (Light-Year) और खगोलीय-एकाई जैसे नए पैमानों को
अपनाया गया ।
प्रकाश-वर्ष (Light-Year)
प्रकाश-वर्ष वो दूरी है जिसे प्रकाश 0 से
299.792.5(लगभग 3 लाख) किलो-मीटर प्रति सेकंड के गति के आधार पर सूर्य ओर पृथ्वी
के बीच की औसात दूरी को तय करता है । आजकल यह सौरमंडल की दूरी को मापने के लिए एक
मुख्य एकाई बन गया है ।
अंतरिक्ष मे कुछ ऐसे प्रकाश भी हैं जिसे हम देख नही
सकते ओर कुछ ऐसे ध्वनि भी हैं जिसे हम सुन नही सकते । इस बात की पुष्टि तब हुई जब
एक ब्रिटिश खगोलशास्त्री विलियम हर्षल ने इंफ्रा-रेड रेडीऐशन का पता लगाया ।
आधुनिक खगोलिकी
की शुरुवात
आधुनिक खगोलिकी की
शुरुवात गैलीलियो गैलीली से हुई । सन 1609 मे गैलीलियो
ने डेनमार्क मे हेन्स लिपरशे के बनाई दूरबीन के बारे मे सुना । उन्होंने इस दूरबीन को और
अधिक सुधार कर एक टेलिस्कोप (Telescope) बनाया , और इसके साथ
ही गैलीलियो ने अनेक खोज की। इन्होंने ही सबसे पहले ये बताया था की चाँद की सतह
ऊबड़-खाबड़ है , इन्होंने ब्राहस्पति के 4 चंदमाओ का बारे मे बताया और सूर्य का
धब्बों का पता लगाया ।
सन 1668 मे न्यूटन ने
रिफ्लेक्टर टेलिस्कोप का आविस्कार किया । रिफ्लेक्टर टेलिस्कोप
मे प्रकाश को एक बड़े लेंस द्वारा एकत्र किया जाता था इसके लिए रिफ्लेक्टर
टेलिस्कोप मे एक बड़ा सा स्पेरिकल मिरर(Spherical Mirror)
लगाया गया था । दोनों प्रकाश की दूरबीन अभी भी काम मे लाई जाती हैं ।
खगोलिकी के इतिहास मे ऑपटिकाल
टेलिस्कोप (Optical Telescope)
का आविस्कार एक महत्वपूर्ण घटना है । आम लोग और खगोलशास्त्री को इसने इतना आकर्षित
किया की सभी बड़े से बड़े देश उन्नत टेलिस्कोप बनाने के होड मे लग गए ।
Radio
Astronomy (रेडियो खगोलिकी)
सन 1931 मे एक अमेरिकी रेडियो इंजीनियर कार्ल जंसकी (Karl jansky) ने
बेल टेलीफोन लैब मे काम करते हुए अंतरिक्ष से निरंतर आते हुए विकिरण को देखा । उस समय
किसी ने भी इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन एक अमेरिकी रेडियो ऑपरेटर ग्रोते रेबर्
(Grote Reber) का ध्यान इस
ओर गया और वो इस अध्ययन मे अकेले ही लग गए । उन्होंने लगभग 10 सालों तक अकेले ही अंतरिक्ष
का अध्ययन किया । सन 1937 मे उन्होंने विश्व की सबसे पहली रेडियो दूरबीन को अपने घर
की पीछे ही लगाया ।
रेडियो दूरबीन कई तरह से प्रकाश दूरबीन जैसा ही था । इसमे
एक अंटीना (Antina) लगा होता है जो अंतरिक्ष से आने वाली सिग्नल()
को पकड़ कर कंप्युटर मे भेजता है ।
छटे दसक मे उपग्रह (Satellite) टेक्नॉलजी
आया जिसके कारण अंतरिक्ष का अध्ययन पृथ्वी के बाहर जाकर भी होने लगा । इस प्रकार हम
अंतरिक्ष का आध्यान 2 तरह से करने लगे पृथ्वी के अंदर ओर पृथ्वी के बाहर इससे खगोलिकी
मे बहुत सारे नए नए चीज़े मिलने लगी जैसे एक्स-रे(X-Ray), अल्ट्रवाइअलिट
रे (Ultraviolet-rays),गामा रे (Gama-rays),इन्फ्रारेड रे(Infrared-rays) आदि ।




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