विश्व की आर्थिक प्रणाली

 भारत मे अर्थव्यवस्ता Indian Economy in hindi

भारतीय अर्थव्यवस्ता  अंग्रेजो के समय ओर अंग्रेजो के बाद 

आर्थिक प्रणाली


विश्व मे 3 तरह की आर्थिक प्रणाली है –

  1. पूंजीवादी अर्थ व्यवस्था
  2. समाजवादी अर्थ व्यवस्था
  3. मिश्रित अर्थ व्यवस्था

1.पूंजीवादी अर्थ व्यवस्था

यह प्रणाली संपत्ति और निजी लाभ पर आधारित है ।

इस प्रणाली मे किमतों का निर्धारण मांग एवं पूर्ति के आधार पर होती है । इसका अर्थ यह है की समान की कीमतें बाजार पर निर्भर होती है ।

अर्थव्यवस्था पर सरकार की भूमिका न्यूनतम होती है । यहाँ सरकार बस एक Regulator की तरह होता है ।

यहाँ बाजार की शक्तियों का प्रभाव ज्यादा होता है ।

लगभग सारे चीजें निजी (Private) होती हैं ।

यह प्रणाली आमेरिक ,जापान ,पश्चिम यूरोप जैसे देशों मे लागू है ।  

लाभ

देश मे प्रतिसप्रधा का भाव रहता है जिससे लोगों को सही सामान मिलता है ।

देश मे बेरोजगारी नहीं होती । सभी लोगों के पास पैसे और रोजगार होता है ।

देश मे बहुत निवेसक होते हैं जिससे देश उन्नत होता है ।

हानि

वस्तुओ का मूल्य हमेशा अधिक होता है ।

निजी कॉम्पनीया ज्यादातर अपना निजी लाभ ही देखती हैं  

2.समाजवादी अर्थ व्यवस्था

इस प्रणाली मे सारी चीजें सरकार की होती है ।

स्वामित्व मे सभी का अधिकार होता है । अर्थात सारी चीजों को सभी लोग प्रयोग कर सकते हैं , सभी का सामना अधिकार होता है ।

उत्पादन की सभी चीजों पर सरकार का अधिकार होता है ।

किमतों का निर्धारण सरकार द्वारा होता है ।

यह प्रणाली रूस ,सोवियत संघ और चीन जैसे देशों मे लागू है ।

लाभ

समाज कल्याण का उद्देस्य होता है ।

कोई प्रतिसप्रधा नहीं होती ।

संसाधनों का ज्यादा और उचित उपयोग होता है ।

आय और धन का समान वितरण होता है ।

उपभोगताओ की आवस्यकताओ की संतुष्टि होती है ।  

हानि

लागत की गलत गणना हो जाती है ।

यहाँ तानाशाह प्रणाली लग जाती है जिससे यहाँ की सरकार ज्यादा शक्तिसाली हो जाती है ।   

जिससे लोगों पर दबाव बनाया जाता है और लोगों पर मनमाना कानून लगाया जाता है।  

3.मिश्रित अर्थ व्यवस्था

यह प्रणाली पूंजीवादी अर्थ व्यवस्था और समाजवादी अर्थ व्यवस्था का मिश्रण है ।

यहाँ पर स्वामित्व सरकार तथा निजी दोनों के पास होता है ।

इस प्रणाली मे नागरिकों को ज्यादा छूट और अधिकार प्राप्त होती है ।

उत्पादन की चीजों पर सरकार तथा बाजार दोनों का ही प्रभाव होता है ।

इस प्रणाली मे किमतों का निर्धारण मांग एवं पूर्ति के आधार पर होती है पर अगर जरूरत पड़े तो सरकार भी हस्तछेप कर सकती है ।

यह प्रणाली हमारे भारत जैसे देशों मे लागू है ।

हानि

रास्ट्रीयकरण का भय बना रहता है इसका अर्थ यह है की सरकार जब चाहे किसी भी निजी संथा को अपना बात सकती है ।

अकुसलता और भ्रस्टाचार बड़े स्तर पर होता है ।

आर्थिक शक्तियों का केन्द्रीकरण हो जाता है ।

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